तलवार
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पंकज मिश्रा, चाकुलिया: 'चढ़ चेतक पर तलवार उठा रखता था भूतल पानी को, राणा प्रताप सिर काट करता था सफल जवानी को'। मुगल सम्राट अकबर के समक्ष आजीवन नहीं खिलने और उनकी विशाल सेना के खिलाफ लोहा लेकर अदम्य साहस व वीरता की मिसल पेश करनेवाले चित्तगढ़ के महानायक महाराज प्रताप को भला कौन नहीं जानता। इतिहास में उनका नाम स्वर्ण वर्ण में दर्ज है। लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि महाराणा प्रताप के साथ चित्तगढ़ छोड़कर निकले कई सिसोदिया राजपूतों के वंशज लगभग 450 साल बाद भी वापस चित्तगढ़ नहीं लौटे हैं। कहा जाता है कि तब तक उन्होंने शपथ ली थी कि जबतक महाराणा प्रताप मेवाड़ पर कब्जा नहीं कर रहे, तब तक वे वापस नहीं लौटेंगे। वे आज भी अपना शपथ धारणाने को सपरिवार पूरे देश में घूमते-घूमते औजार बनाने और बेचने का काम करते हैं।देश के विभिन्न हिस्सों के लोग इन्हें बंजारा व लोहर बढ़ाईया के नाम से भी जानते हैं। लोहे के हथियार बनाने में ये बेहद उपयोगी होते हैं। कुल्हाड़ी, शेरी, चापड़ आदि बनाकर पट्टियाँ हैं। पुरुषों के साथ महिलाएं और बच्चे भी इस काम में शामिल रहते हैं। ऐसे ही बंजारों की एक टोली इन दिनों चाकुलिया आई हुई है। शहर के नए बाजार राम मंदिर के समीप मैदान में गौड़कर तीन-चार बंजारा परिवार के लोग लोहे का हथियार बनाने व बेचने का काम कर रहे हैं। टोली में शामिल पूर्ण हसह, सरदार, सह, मंगल आदिसह आदि ने बताया कि वे वर्ष में छह महीने से अधिक समय देश भर में घूमते हैं। अमूमन दीवाली के समय घर से निकलते हैं और होली के बाद लौटते हैं। पूर्ण केसह ने बताया कि वे मूलत: आरक्षित के चित्तगढ़ के रहने वाले हैं,पर वर्तमान में मध्य प्रदेश के दमोह जिले में बस गए हैं। यह पूछने पर कि हथियार बनाने व बेचने का काम कब से कर रहे हैं, उन्होंने कहा कि कई पीढि़यों से यह सिलसिला चला आ रहा है। वर्तमान में इस समुदाय के लोग चाकुलिया के अलावा पूर्वी भूमसह पृष्ठभूमि जिले के विभिन्न शहरों में टोल बनाने और बेचने का काम कर रहे हैं।]]

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